Wednesday, October 5, 2022

Captain Vikram Batra: कैसे की विक्रम बत्रा ने प्वाइंट 4875 चोटी पर फतह, फिर हो गये शहीद, जानें पूरी बायोग्राफी

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कैप्टन विक्रम बत्रा के विषय में कौन नहीं जानता। कारगिल युद्ध के हीरो और परमवीर चक्र से सम्मानित विक्रम (Captain Vikram Batra) की आज पुण्यतिथि है और पूरा देश आज नम आंखों से विक्रम की शहादत के लिए उन्हें याद कर रहा है। कारगिल अपने घायल सैनिकों की मदद करते समय उन्हें गोली लग गई थी और वो स्वर्ग सिधार गए थे। पाकिस्तान ने धोखे से जब 1999 कारगिल के कई चोटियों पर कब्जा कर लिया था, भारतीय सेना ने उन चोटियों को कब्जा मुक्त कराने के लिए ऑपरेशन विजय शुरू किया, इस युद्ध में कैप्टन विक्रम बत्रा ने सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी इस बहादुरी के लिए भारत सरकार ने मरणोपरांत कैप्टन विक्रम बत्रा को सर्वोच्च और सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया।

जन्‍म, परिवार और शिक्षा
पालमपुर निवासी शिक्षक जी.एल. बत्रा और कमलकांता बत्रा के घर 9 सितंबर 1974 को दो बेटियों के बाद दो जुड़वां बच्चों का जन्म हुआ। माता कमलकांता की श्रीरामचरितमानस में गहरी श्रद्धा थी तो उन्होंने दोनों का नाम लव और कुश रखा। लव यानी विक्रम और कुश यानी विशाल। पहले डीएवी स्कूल, फिर सेंट्रल स्कूल पालमपुर में दाखिल करवाया गया। सेना छावनी में स्कूल होने के कारण विक्रम प्रतिदिन सेना के जवानों को नजदीक से देखते थे। साथ ही विक्रम को सेना की वीरता की कहानियां, सीरियल और फिल्में भी खूब भाती थी, इसी कारण विक्रम में स्कूल के समय से ही देश प्रेम प्रबल हो उठा।

स्कूल में विक्रम शिक्षा के क्षेत्र में ही अव्वल नहीं थे, बल्कि टेबल टेनिस में अव्वल दर्जे के खिलाड़ी होने के साथ उनमें सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग लेने का भी जज़्बा था। 12वीं के बाद विक्रम चंडीगढ़ चले गए और डीएवी कॉलेज, चंडीगढ़ में विज्ञान विषय में स्नातक की पढ़ाई शुरू कर दी। अपने कॉलेज के दिनों में, कैप्टन विक्रम बत्रा एनसीसीए एयर विंग में शामिल हो गए। यहां कैप्टन विक्रम बत्रा ने सी सर्टिफिकेट के लिए क्वालिफाई किया और उन्‍हें एनसीसी में कैप्टन विक्रम बत्रा का रैंक दिया गया। 1994 में, उन्होंने एनसीसी कैडेट के रूप में गणतंत्र दिवस परेड में भाग लिया था। 1995 में अपने कॉलेज के दौरान, उन्हें एक शिपिंग कंपनी के साथ मर्चेंट नेवी के लिए चुना गया था, लेकिन उन्होंने अपना इरादा बदल दिया। 1995 में उन्होंने स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद अंग्रेजी में एमए करने के लिए पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में दाखिला लिया।

सेना में करियर

सेना में जाने के लिए 1996 में उन्होंने सीडीएस की परीक्षा दी और इलाहाबाद में सेवा चयन बोर्ड द्वारा चयन हुआ। वह इस परीक्षा में चयनित होने वाले शीर्ष 35 उम्मीदवारों में से एक थे, भारतीय सैन्य अकादमी में शामिल होने के लिए उन्होंने अपने कॉलेज से ड्रॉप आउट किया। दिसंबर 1997 में प्रशिक्षण समाप्त होने पर उन्हें 6 दिसम्बर 1997 को जम्मू के सोपोर नामक स्थान पर सेना की 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति मिली। मार्च 1998 में, उन्हें यंग ऑफिसर्स कोर्स पूरा करने के लिए इन्फैंट्री स्कूल में पांच महीने के लिए मध्य प्रदेश भेजा गया था।

कोर्स पूरा होने पर, उन्हें अल्फा ग्रेडिंग से सम्मानित किया गया और जम्मू-कश्मीर में अपनी बटालियन में फिर से शामिल किया गया। उन्होंने 1999 में कमांडो ट्रेनिंग के साथ कई प्रशिक्षण भी लिए। कारगिल युद्ध के दौरान अपनी शहादत से पहले, होली के त्यौहार के दौरान सेना से छुट्टी पर अपने घर आए, यहां अपने सबसे अच्छे दोस्त और मंगेतर डिंपल चीमा से मिले, इस दौरान युद्ध पर भी चर्चा हुई, जिस पर कैप्‍टन ने कहा कि मैं या तो लहराते तिरंगे को लहरा कर आऊंगा या फिर तिरंगे में लिपटा हुआ, पर मैं आऊंगा जरूर।

कारगिल युद्ध, 5140 चोटी पर फतह

पहली जून 1999 को उनकी टुकड़ी को कारगिल युद्ध में भेजा गया। हम्प व राकी नाब स्थानों को जीतने के बाद विक्रम को कैप्टन बना दिया गया। इसके बाद श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर सबसे महत्त्वपूर्ण 5140 चोटी को पाक सेना से मुक्त करवाने की ज़िम्मेदारी कैप्टन बत्रा की टुकड़ी को मिली। कैप्टन बत्रा अपनी कंपनी के साथ घूमकर पूर्व दिशा की ओर से इस क्षेत्र की तरफ बढ़े और बिना शत्रु को भनक लगे हुए नजदीक पहुंच गए। कैप्टेन बत्रा अपने साथियों के साथ दुश्मन के ठिकानों पर सीधे आक्रमण कर दिया। सबसे आगे रहकर दस्ते का नेतृत्व करते हुए उन्होनें बड़ी निडरता से शत्रु पर धावा बोल दिया और आमने-सामने की लड़ाई में चार दुश्‍मनों को मार डाला।

बेहद दुर्गम क्षेत्र होने के बावजूद विक्रम बत्रा ने अपने साथियों के साथ 20 जून 1999 को सुबह तीन बजकर 30 मिनट पर इस चोटी को अपने कब्जे में ले लिया। कैप्टन विक्रम बत्रा ने जब इस चोटी से रेडियो के जरिए अपना विजय उद्घोष यह दिल मांगे मोर कहा तो सेना ही नहीं बल्कि पूरे भारत में उनका नाम छा गया। इसी दौरान विक्रम के कोड नाम शेरशाह के साथ ही उन्हें कारगिल का शेर की भी उपाधि दी गई। अगले दिन चोटी 5140 में भारतीय झंडे के साथ विक्रम बत्रा और उनकी टीम का फोटो मीडिया में आ गयी।

प्वाइंट 4875 चोटी पर फतह और शहादत

इसके बाद भारतीय सेना ने 7 जुलाई 1999 को, प्वाइंट 4875 चोटी को कब्ज़े में लेने के लिए अभियान शुरू किया। इसके लिए भी कैप्टन विक्रम और उनकी टुकड़ी को जिम्मेदारी सौंपी गई। यह एक ऐसी मुश्किल जगह थी जहां दोनों और खड़ी ढलान थी और उसी एकमात्र रास्ते पर दुश्‍मनों ने नाकाबंदी कर रखी थी। इस अभियान को पूरा करने के लिए कैप्टन विक्रम बत्रा एक संर्कीण पठार के पास से दुश्‍मन ठिकानों पर आक्रमण करने का निर्णय लिया।

युद्ध के दौरान आमने-सामने की भीषण लड़ाई में कैप्टन विक्रम बत्रा ने पांच दुश्मन सैनिकों को पॉइंट ब्लैक रेंज में मार गिराया। इस दौरान वे दुश्मन स्‍नाइपर के निशाने पर आ गए और गंभीर रूप से जख्मी हो गए। इसके बाद भी वे रेंगते हुए दुश्मनों पर ग्रेनेड फेंक कर मौत के घाट उतार दिया। इस युद्ध में उन्होंने सबसे आगे रहकर लगभग एक असंभव कार्य को पूरा कर दिखाया। उन्होंने जान की परवाह भी नहीं की और इस अभियान को दुश्मनों की भारी गोलीबारी में भी पूरा किया, लेकिन बुरी तरह घायल होने के कारण कैप्टन विक्रम बत्रा शहीद हो गए।

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