Sunday, October 2, 2022

आंध्र-तेलंगाना में बसे आदिवासियों की टारगेट किलिंग: सलवा जुडूम के दौरान जान बचाकर अविभाजित आंध्रप्रदेश में शरण लेने वाले आदिवासियों को मार रहे हैं नक्सली

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रायपुर3 मिनट पहलेलेखक: देवेंद्र गोस्वामी/ प्रशांत गुप्ता

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मड़काम इथा की पत्नी।

सलवा जुडूम के दौरान जान बचाकर अविभाजित आंध्रप्रदेश में शरण लेने वाले आदिवासियों को नक्सली मार रहे हैं। बीते तीन महीने में उन तीन ग्रामीणों को चुन-चुनकर मारा है, जो वहां बसे आदिवासियों को छत्तीसगढ़ वापसी की पहल कर रहे थे। इन हत्याओं से छत्तीसगढ़ के 35,000 आदिवासी दहशत में हैं, जो आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के 230 गांवों में रह रहे हैं।

इन हत्याओं के जरिए नक्सली, उन लोगों में दहशत पैदा करना चाहते हैं, जो छत्तीसगढ़ वापस आना चाहते हैं। इस पर बस्तर, तेलंगाना और आंध्रप्रदेश के गांवों से भास्कर की ग्राउंड रिपोर्ट, जहां बीते 17 सालों से इनके जीवन में सूर्यास्त के बाद कभी उजियारा (बिजली) नहीं हुआ।

इस नक्सली दहशत के कारण बस्तर के 35 हजार से अधिक आदिवासी 17 साल बाद भी अपने घर नहीं लौट पाए हैं। पिछले तीन महीने में तीन लोगों की हत्या के बाद फिर से अपनी जमीन पर आने के नाम से रुह कांप जाती है। नक्सली इन हत्याओं के माध्यम से घर वापसी करने वालों को डराने की कोशिश कर रहे हैं। 17 अप्रैल को दुधी गंगा की हत्या के बाद घर वापसी की हसरत रखने वालों का मन बदल गया है।

इससे पहले मरकम इथा और अबका पांडु की भी नक्सली हत्या कर चुके हैं। लोगों में जो दहशत है, इसे जानने के लिए भास्कर की टीम आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के उन क्षेत्रों में पहुंची जहां छत्तीसगढ़ के आदिवासी जंगलों में जीवन गुजार रहे हैं। तेलंगाना के भद्रादी जिला अंतर्गत ग्राम राजीवनगरम और ऐर्राबोर के दूरस्थ क्षेत्रों में न बिजली है और न पानी।

राजीवनगरम में मरकम इथा की पत्नी से मुलाकात हुई। वह सिर्फ गौड़ी बोल पाती हैं, तो एक स्थानीय नागरिक ने ट्रांसलेट कर उसकी बात बताई। वे कहती हैं कि हम लौटे तो नक्सली सबको मार डालेंगे। यहां रहने वाले लोगों का कहना है कि हम तेलंगाना-आंध्रा में सुरक्षित हैं। बस सरकार हमें कोया जनजाति मानकर प्रमाण-पत्र जारी कर दे।

जो बच्चे दसवीं-बरहवीं तक पढ़ चुके हैं, उन्हें नौकरी नहीं मिलती। एर्राबोर में 26 परिवार रहते हैं। यहां मिले माड़वी हिरेश ने बताया कि उनके पास पांच एकड़ जमीन थी, जिस पर खेती करते थे। तेलंगाना के वन विभाग वालों ने इस साल तीन एकड़ जमीन वापस ले ली है। गांव में बिजली नहीं है। शाम 7 बजे के बाद उनके जीवन में अंधेरा रहता है।

लड़कियां पांचवीं के बाद पढ़ नहीं पाती। आंध्र सरकार की तरफ से प्रति छह किलो चावल हर महीेन मिलता है। उधर आंध्रप्रदेश के गिलेटवाड़ा में, जहां दुधी गंगा रहता था, उसका परिवार दहशत में है। उसकी पत्नी सुबह से लेकर शाम तक जंगल में ही रहती है। गांव का कोई भी व्यक्ति वापसी पर बात नहीं करना चाहता।

जाति प्रमाण-पत्र को लेकर उलझा है मामला
तेलंगाना में रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता एवं सितारा एनजीओ के संचालक डॉ. हनीफ कहते हैं कि तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की सरकारें, छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को राज्य से नहीं निकाल रहीं। हां, यहां पर उन्हें अगर अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलवानी है तो छत्तीसगढ़ सरकार उन्हें कोया जनजाति मानते हुए जाति प्रमाण-पत्र दे। बस यहीं पेंच फंसा हुआ है। तेलंगाना में कोया को मान्यता है, जबकि छत्तीसगढ़ से इन्हें मुरिया जनजाति का प्रमाण-पत्र दिया जाता है। इसे वहां मान्यता नहीं है।

फैक्ट फाइल

  • आंध्रप्रदेश व तेलंगाना के 230 गांवों में हैं आदिवासी
  • छत्तीसगढ़ के 35 हजार लोग इन गांवों में रह रहे
  • 170 गांवों में बिजली नहीं 75 गांवों में सड़क भी नहीं

नक्सलियों ने इन्हें उतारा मौत के घाट, इसलिए डरे हैं लोग

मड़काम इथा
27 मार्च को बीजापुर के कोंडापल्ली में नक्सलियों ने इथा को मौत के घाट उतार दिया था। वह परिवार से मिलने छत्तीसगढ़ आया था। वह तेलंगाना के राजीवनगरम में रहता था। इथा की पत्नी ने बताया कि नक्सलियों ने परिवार वालों को मारने की धमकी दी है।

दुधी गंगा
नक्सलियों ने सुकमा के कोलईगुड़ा में 17 अप्रैल को दुधी गंगा की हत्या की थी। वह आंध्र के गिलेटवाड़ा में रहता था। दुधी छत्तीसगढ़ वापसी के लिए प्रयासरत था। वह सीएम भूपेश बघेल और दिल्ली में केंद्रीय मंत्री रेणुका सिंह से मुलाकात की थी।

अबका पांडु
तेलंगाना के चेरला में रहने वाले पांडु की हत्या भी नक्सलियों ने 27 मार्च को की थी। पांडु अपने मित्र मड़काम इथा के साथ छत्तीसगढ़ आया था। बीजापुर के कोंडापल्ली पंचायत क्षेत्र में हत्या हुई। पांडु छत्तीसगढ़ वापसी की मुहिम का हिस्सा था।

इन 2 वजहों से डरे हैं प्रदेश के आदिवासी

  • तीन महीने में नक्सलियों ने तीन आदिवासियों की हत्या कर दी। इन घटनाओं से अब आंध्रा-तेलंगाना में रहे आदिवासी खौफजदा हैं। इन्हें डर है कि अगर ये वापसी करते हैं तो नक्सली इनकी भी हत्या कर देंगे। अगर, नहीं करें तो संगठन में शामिल होने का दबाव डालेंगे।
  • सुकमा जिला प्रशासन द्वारा आंध्रा, तेलगांना में बसे छत्तीसगढ़ के नागरिकों की लिस्टिंग शुरू की है। मगर, पीड़ितों को डर है कि अगर सरकार उन्हें छत्तीसगढ़ में लाकर बसाती है तो ग्रामीण विरोध करेंगे। इससे खूनी संघर्ष का अंदेशा रहेगा। इन्हें सुरक्षा का डर सता रहा है।

नक्सली छीन लेते हैं आधा पैसा

पीड़ित आदिवासियों का कहना है कि ये आंध्रा-तेलंगाना में जो काम करते हैं, या खेती करते हैं उससे जो आय होती है वह पूरी उनकी होती है। मगर, छत्तीसगढ़ में उन्हें पुन: बसाया गया तो नक्सली आधा पैसा छीन लेंगे।

आंध्रा और तेलंगाना में जाकर रहे छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की सूची तैयार की जा रही है। इनकी मांगों व बातों को रिपोर्ट में रखा जाएगा। पलायन कर जाने वालों में 90 प्रतिशत सुकमा के आदिवासी हैं।
-श्यामलाल धावड़े, नोडल अधिकारी एवं बस्तर संभागायुक्त

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